आज फिर चाहत की पतंग उड़ने को जी चाहता है,
खुली हवा में सांस लेने का ज़िर्क जो किया किसी ने,
अँधेरी राहों से गुज़रते हुए,
सूरज की लहराई हुई रौशनी को छूने कॊ दिल करता है|
लहराता चलूँ ख्वाब के पंखों को,
नील सी आसमान के बीच मुस्कराती हुई
रुई सी बादलों में सोने का दिल करता है|
बारिश की बूँदें जो गिरी थी
भिगो गयी थी जज़बातों को,
उन बारिश के पार जाने को दिल करता है |

3 thoughts on “ख्वाब

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